Punjab gets crumbs from Centre’s textile schemes; no package for cotton growers despite diversification push: पंजाब सरकार के पूर्व स्पेशल चीफ सेक्रेटरी और रिटायर्ड IAS अधिकारी केबीएस सिद्धू ने कहा, पंजाब को केंद्र के टेक्सटाइल स्किलिंग फंड का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिला है। इसके अलावा, पंजाब के कपास किसानों को कोई राहत पैकेज भी नहीं दिया गया है, जबकि विशेषज्ञ लगातार राज्य के किसानों से धान की खेती छोड़कर दूसरी फसलें अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
पूरे भारत में 2,56,985 श्रमिकों को प्रशिक्षित किया गया
केबीएस सिद्धू ने बताया कि केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय की ‘समर्थ’ स्किलिंग योजना के तहत फरवरी 2024 तक पूरे भारत में 2,56,985 श्रमिकों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें से पंजाब के केवल 759 श्रमिक थे यानी कुल संख्या का लगभग 0.3 प्रतिशत। ‘संशोधित टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड योजना’ (ATUFS) के तहत, 2020-21 से 2023-24 के बीच देश भर में जारी किए गए 1,868 करोड़ रुपये में से पंजाब की इकाइयों को केवल 73 करोड़ रुपये (लगभग 3.9 प्रतिशत) मिले, जबकि गुजरात को इसमें से लगभग आधा हिस्सा मिला। मार्च 2022 से नई टेक्सटाइल इकाइयों को कोई कैपिटल सब्सिडी नहीं दी गई है।
केंद्र की टेक्सटाइल योजनाओं में लुधियाना का जिक्र तक नहीं
केबीएस सिद्धू ने कहा, “सर्दियों में भारत जो कपड़े पहनता है, उसका एक बड़ा हिस्सा लुधियाना में बनता है। फिर भी, केंद्र की टेक्सटाइल योजनाओं में लुधियाना का जिक्र तक नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “अब केंद्र सरकार 25,000 करोड़ रुपये की ‘समर्थ 2.0’ योजना तैयार कर रही है। अगर यह पुरानी योजना की तरह ही रही, तो सारा पैसा फिर से तिरुपुर, बेंगलुरु और सूरत चला जाएगा, और पंजाब के लोग बस अखबारों के बिजनेस पेज पर इसके बारे में पढ़ते रह जाएंगे।”
पंजाब में कपास की खेती का रकबा घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर रह गया
कपास के मुद्दे पर केबीएस सिद्धू ने कहा कि स्थिति विरोधाभासी है। इस खरीफ सीजन में पंजाब में कपास की खेती का रकबा घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर रह गया है, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। जबकि 2020 में यह रकबा पांच लाख हेक्टेयर से अधिक था। गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) के बार-बार हमलों और फसल की खरीद को लेकर अनिश्चितता के कारण किसान इस खेती से दूर हो गए हैं।
कपास किसानों के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई पैकेज नहीं दिया गया
इसके बावजूद, कपास किसानों के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई पैकेज नहीं दिया गया है। वहीं, राज्य सरकार की ओर से दी जा रही 33 प्रतिशत बीज सब्सिडी भी इस गिरावट को रोकने में नाकाम रही है। केबीएस सिद्धू ने कहा, “हर कोई पंजाब के किसानों से कहता है कि वे धान की खेती छोड़ दें और भूजल स्तर (water table) को बचाएं। लेकिन जब वे कपास की खेती करते हैं, तो उन्हें कीटों के हमले का सामना करना पड़ता है, फसल की खरीद की कोई गारंटी नहीं होती, और अब जब उनकी फसल मंडी पहुंचती है, तो उसी समय बिना ड्यूटी (शुल्क) के आयात शुरू हो जाता है।”
देश में पहले से ही लगभग 93.59 लाख गांठों (bales) का रिकॉर्ड स्टॉक मौजूद
उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता कि सुबह तो आप फसल विविधीकरण (diversification) की सलाह दें और शाम को उसी के खिलाफ काम करें।” उन्होंने बताया कि कच्चे कपास के आयात पर कस्टम ड्यूटी में छूट 31 अक्टूबर को खत्म हो रही है, और इसे दिसंबर तक बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। पंजाब की कपास सितंबर के आखिर से दिसंबर तक मालवा की मंडियों में पहुंचती है। ऐसे में, अगर इस छूट को दिसंबर तक बढ़ा दिया जाता है, तो यह सीधे किसानों के फसल बेचने के सीजन पर असर डालेगा। ऊपर से, देश में पहले से ही लगभग 93.59 लाख गांठों (bales) का रिकॉर्ड स्टॉक मौजूद है।
मंडियों में कपास की कीमतें पहले ही कम हो गई हैं; सितंबर के मध्य में अबोहर में जो कीमत लगभग ₹9,025 प्रति क्विंटल थी, वह अक्टूबर की शुरुआत में बठिंडा में घटकर करीब ₹8,200 प्रति क्विंटल रह गई है। केबीएस सिद्धू ने आज कपड़ा मंत्रालय, कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय, राजस्व विभाग, और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय सचिवों को एक संयुक्त पत्र लिखा है, जिसकी एक प्रति पंजाब के मुख्य सचिव को भी भेजी गई है।
उन्होंने ‘समर्थ 2.0’ (Samarth 2.0) योजना में लुधियाना जैसे कम सेवा वाले क्लस्टरों के लिए एक निश्चित हिस्सा (guaranteed share) आरक्षित करने, नई ‘टेक्सटाइल विस्तार और रोजगार योजना’ (Textile Expansion and Employment Scheme) के तहत लुधियाना के होजरी क्लस्टर को शामिल करने, मालवा की सभी मंडियों में ‘कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ (CCI) द्वारा पूरी फसल की खरीद सुनिश्चित करने, और उत्तर क्षेत्र (North Zone) में फसल कटाई के महीनों के दौरान बिना ड्यूटी वाले आयात पर सीमा तय करने की मांग की है। उन्होंने पंजाब सरकार से आग्रह किया है कि इस योजना के दिशा-निर्देश (guidelines) जारी होने से पहले ही, वह केंद्र सरकार को अपना प्रस्ताव सौंप दे।





