Khet Bachao Abhiyan: हरित क्रांति ने पंजाब को देश का अन्न भंडार बना दिया था। गेहूं और धान की रिकॉर्ड पैदावार ने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की, लेकिन पांच दशक बाद अब पंजाब की खेती एक नए संकट का सामना कर रही है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार गेहूं-धान की खेती, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल और मिट्टी में जैविक तत्वों की कमी के कारण राज्य की जमीन धीरे-धीरे अपनी उर्वरता खो रही है। इसी चुनौती से निपटने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), लंगरोया ने जून महीने में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया। इस एक महीने के अभियान के दौरान शहीद भगत सिंह नगर जिले के 6,500 से अधिक किसानों, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), पंचायत प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों को मिट्टी संरक्षण और टिकाऊ खेती के प्रति जागरूक किया गया।
क्यों पड़ गई ‘खेत बचाओ अभियान’ की जरूरत?
विशेषज्ञों का कहना है कि कई किसान यह मानते हैं कि अधिक खाद डालने से अधिक पैदावार होगी। हालांकि रासायनिक उर्वरक फसल उत्पादन के लिए जरूरी हैं, लेकिन उनका जरूरत से ज्यादा और असंतुलित इस्तेमाल मिट्टी की संरचना को नुकसान पहुंचाता है। इससे लाभकारी सूक्ष्म जीव कम हो जाते हैं और खेती की लागत बढ़ने लगती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, खेतों में उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जांच के आधार पर होना चाहिए, लेकिन अधिकांश किसान पारंपरिक तरीके से अनुमान के आधार पर खाद डालते हैं।
मिट्टी की सेहत पर बढ़ा खतरा
पंजाब के पास देश की कुल भौगोलिक भूमि का केवल 1.53 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन देश में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरकों का करीब 8 से 9 प्रतिशत उपयोग इसी राज्य में होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब की मिट्टी में जैविक तत्व (ऑर्गेनिक मैटर) की मात्रा केवल 0.51 प्रतिशत रह गई है, जबकि इसकी न्यूनतम जरूरत 1 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय मानक 3 से 5 प्रतिशत माना जाता है। इसका सीधा असर मिट्टी की उत्पादकता, जल धारण क्षमता और फसलों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
किसानों को क्या सलाह दे रहे वैज्ञानिक?
अभियान के दौरान कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने किसानों को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए-
- मिट्टी की जांच करवाकर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें।
- जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से बचें।
- हरित खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) को बढ़ावा दें।
- जैविक तत्वों को बढ़ाने वाली फसलों की खेती करें।
- मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाएं।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एसोसिएट डायरेक्टर (प्रशिक्षण) डॉ. प्रदीप कुमार ने कहा कि मिट्टी की उर्वरता बचाना किसानों की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि मिट्टी कमजोर होती गई तो किसानों की लागत बढ़ेगी और उत्पादन घटने लगेगा।
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हरित खाद से कैसे सुधरेगी मिट्टी?
केवीके लंगरोया के वैज्ञानिक किसानों को सनहेम्प जैसी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिन्हें हरित खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं, पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर होती है और जमीन की जल धारण क्षमता में सुधार आता है। इसके लिए किसानों को बीज उत्पादन और संरक्षण की ट्रेनिंग भी दी जा रही है।
सिर्फ खेती नहीं, स्वास्थ्य का भी सवाल
गृह विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. राजिंदर कौर के अनुसार, मिट्टी में अत्यधिक रसायनों का इस्तेमाल खाद्य श्रृंखला के जरिए मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि अच्छी मिट्टी ही गुणवत्तापूर्ण भोजन की नींव है, इसलिए मिट्टी की सेहत का मुद्दा केवल कृषि नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
गांव-गांव पहुंचा अभियान
‘खेत बचाओ अभियान’ सिर्फ एक सेमिनार तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने गांवों में जाकर किसानों, पंचायतों, सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और कृषि संगठनों से सीधे संवाद किया। छह विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सरपंच सम्मेलनों के माध्यम से मिट्टी संरक्षण का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाया गया। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी मिट्टी को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पंजाब की कृषि और किसानों की आर्थिक स्थिति दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए अब समय केवल अधिक उत्पादन का नहीं, बल्कि “खेत बचाने और मिट्टी को फिर से जिंदा करने” का है।






